25/10/2021

Rajputana Shaan Maharana Pratap and his Chetak

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(राजपूताना शान महाराणा प्रताप और उनका चेतक)

भारत पर कोई भी इतिहास की किताब उनके विवरण के बिना पूरी नहीं होगी। आज वीर सपूत, महान योद्धा और अदभुत शौर्य व साहस के प्रतीक महाराणा प्रताप की जयंती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग (पाली) में हुआ था। लेकिन राजस्थान में राजपूत समाज का एक बड़ा तबका उनका जन्मदिन हिन्दू तिथि के हिसाब से मनाता है। चूंकि 1540 में 9 मई को ज्येष्ठ शुक्ल की तृतीया तिथि थी, इसलिए इस हिसाब से इस साल उनकी जयंती 25 मई को भी मनाई जाएगी।

208 किलो का वजन लेकर लड़ते थे प्रताप

महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो का था और उनके छाती का कवच 72 किलो का था। उनके भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था। महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो… और लम्बाई 7 फीट 5 इंच थी। यह बात अचंभित करने वाली है कि इतना वजन लेकर प्रताप रणभूमि में लड़ते थे।

26 फीट का नाला एक छलांग में लांघ गया था प्रताप का चेतक

कहते हैं कि जब कोई अच्छाई के लिए लड़ता है तो पूरी कायनात उसे जीत दिलाने में लग जाती है। ये बात हम इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि उनका घोड़ा चेतक भी उन्हें जीत दिलाने के लिए अंतिम समय तक लड़ता रहा। चेतक की ताकत का पता इस बात से लगाया जा सकता था कि उसके मुंह के आगे हाथी कि सूंड लगाई जाती थी। जब मुगल सेना महाराणा प्रताप के पीछे लगे थी, तब चेतक प्रताप को अपनी पीठ पर लिए 26 फीट के उस नाले को लांघ गया, जिसे मुगल पार न कर सके।

महाराणा प्रताप निस्संदेह, अपने समय के सबसे बहादुर सैनिक थे। उन्हें कभी मौत का डर नहीं था। उन्होंने मुगलों की शक्तिशाली सेना के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी। वह सभी खतरों के बीच जीवन को एक चट्टान के रूप में खड़ा कर देते थे।

राजपूताना शान महाराणा प्रताप हमारे देश के महान देशभक्तों में से एक थे। वह न केवल राजस्थान का गौरव थे बल्कि पूरे देश का अभिमान थे। वह मेवाड़ के महान शासक था। वे राणा उदय सिंह के पुत्र और महान राणा साँगा के पोते थे। महाराणा प्रताप जी एक महान योद्धा, एक बहादुर राजपूत और एक सच्चे देशभक्त थे।

1576 में हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप और अकबर के बीच ऐसा युद्ध हुआ, जो पूरी दुनिया के लिए आज भी एक मिसाल है। महाराणा प्रताप ने शक्तिशाली मुगल बादशाह अकबर की 85000 सैनिकों वाले विशाल सेना के सामने अपने 20000 सैनिक और थोड़े-से संसाधनों के बल पर स्वतंत्रता के लिए वर्षों संघर्ष किया। 30 वर्षों के लगातार प्रयास के बावजूद अकबर महाराणा प्रताप को बंदी न बना सका।

हल्दीघाटी का युद्ध याद अकबर को जब आ जाता था ,

कहते है अकबर महलों में, सोते-सोते जग जाता था!

प्रताप की वीरता के सामने अकबर भी रोया

प्रताप की वीरता ऐसी थी कि उनके दुश्मन भी उनके युद्ध-कौशल के कायल थे। माना जाता है कि इस योद्धा की मृत्यु पर अकबर की आंखें भी नम हो गई थीं। उदारता ऐसी कि दूसरों की पकड़ी गई बेगमों को सम्मानपूर्वक उनके पास वापस भेज दिया था। इस योद्धा ने साधन सीमित होने पर भी दुश्मन के सामने सिर नहीं झुकाया और जंगल के कंद-मूल खाकर लड़ते रहे।

प्रजा के प्रहरी थे प्रताप

 महाराणा प्रताप के पिता उदयसिंह को अपने छोटे बेटे जगमल से लगाव था। इस कारण मृत्यु के समय उदयसिंह ने उन्हीं को राजगद्दी दे दी। उदयसिंह का यह कार्य नीति के खिलाफ हुआ, क्योंकि राजगद्दी के हकदार महाराणा प्रताप थे। वे जगमल से बड़े थे। यह जहर फैलता गया। प्रजा प्रताप को ज्यादा मानती थी। प्रतापसिंह का दिल लुभा लेनेवाला, अपने को प्यारी प्रजा का सेवक समझना, देश और धर्म के नाम पर अपने सर्वस्व का त्याग जैसे अनेक सद्गुणों वाला था। जगमल को गद्दी मिलने पर सभी लोगों को निराशा हुई, लेकिन प्रताप के चेहरे पर शिकन भी न पड़ी।

प्रताप के घोड़े (चेतक) ने बचाई उनकी जान

 प्रताप चुपचाप वहां से चल दिये। प्रताप अपने अश्वागार में गये और घोड़े की जीन कसने की आज्ञा दी। महाराणा प्रताप के पास उनका सबसे प्रिय घोड़ा ‘चेतक’ था। हल्दी घाटी के युद्ध में बिना किसी सहायक के प्रताप अपने पराक्रमी चेतक पर सवार हो पहाड़ की ओर चल पड़ा। उसके पीछे दो मुग़ल सैनिक लगे हुए थे, परन्तु चेतक ने प्रताप को बचा लिया। राणा का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार कराने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ। उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वो दरिया पार कर गया। परन्तु मुग़ल उसे पार न कर पाये। जहा वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है -वहां मंदिर का निर्माण किया गया है। चेतक की बहादुरी की गाथाएं आज भी लोग सुनाते हैं।

1596 में शिकार खेलते समय उन्हें चोट लगी जिससे वह कभी उबर नहीं पाए। 19 जनवरी 1597 को सिर्फ 57 वर्ष आयु में चावड़ में उनका देहांत हो गया।

महाराणा प्रताप के ऐसे कुछ विचार जिनसे आपके सोचने का नजरिया  बदल जाएगा-

1. मातृभूमि और अपने मां में तुलना करना और अन्तर समझना निर्बल और मूर्खों का काम है।

2. समय इतना बलवान है कि राजा को भी घास की रोटी खिला सकता है।

3. ये दुनिया कर्म करने वालों को ही पसंद करती है इसलिए कर्म करो।

4. हार आपसे आपका धन छीन सकती है लेकिन आपका गौरव नहीं।

5. जो बुरे वक्त से डर जाते है उन्हें न सफलता मिलती है और न ही इतिहास में जगह।

6. अगर इरादा नेक हो तो इंसान कभी हार नहीं सकता है।

7. जो इंसान अपने और परिवार के आलावा भी सबके विषय में सोचे वो ही सच्चा नागरिक कहलाने के   योग्य है।

8. अपने कर्मों से वर्तमान को इतना विश्वास दिला दो कि वो भविष्य को भी अच्छा होने पर मजबूर कर     दे।

9. सुख से जीवन जीने से अच्छा है, राष्ट्र के लिए कष्ट सहो।

10. सम्मानहीन व्यक्ति मुर्दे के समान है।

11. शत्रु सफल और शौर्यवान व्यक्ति के ही होते है।”

12. ये संसार कर्मवीरो की ही सुनता है। अतः अपने कर्म के मार्ग पर अडिग और प्रशस्त रहो

->अपने कर्मों से वर्तमान को इतना विश्वास दिला दो कि वो भविष्य को भी अच्छा होने पर मजबूर कर दे।

(Convince the present with your actions so much that it forces the future to be good.) – महाराणा प्रताप

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